Downlod GS24NEWS APP
छत्तीसगढ़

राहुल के साहस को सलाम…वह कमजोर कैसे हो सकता है ?

मजबूत इरादों के आगे हारा चट्टान 

रायपुर 15 जून 22/ राहुल बोल नहीं पाता, सुन नहीं पाता..कमजोर है। उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं…कुछ इस तरह के चर्चाओं के बीच जिंदगी और मौत के बीच बोरवेल में 105 घण्टे से फसे राहुल ने आखिरकार मौत को हरा दिया। उन्हें नई जिंदगी देने में शासन-प्रशासन सहित एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम ने पूरी ताकत झोंक दी थी, लाखों लोगों ने दुआएं की। लेकिन यह भी सत्य है कि जिस विषम परिस्थितियों में राहुल ने खुद को सम्हाला और रेस्क्यू सफल होने तक धैर्य बनाए रखा, यह उनके साहस का ही परिणाम है कि अब सबके साथ सफलता की छाप छप गई है। वरना नाकामी का कलंक, कोशिशों में कमी, हर जगह शासन-प्रशासन को ही नही, दिन-रात संघर्ष करने वालों को भी चिढ़ाती। 10 जून को बोरवेल में गिरने के बाद शुरू हुआ ‘‘ऑपरेशन राहुल-हम होंगे कामयाब‘‘ बड़ी ही मुश्किल से जीवन और मौत के सवालों के बीच लगभग 105 घण्टे बाद राहुल की वापसी के साथ ही सफल हुआ। खुशी है कि इस अभियान से मैं जुड़ा और यहां राहुल को बचाने के लिए की जा रही मिनट दर मिनट संघर्ष को देखा।

चूंकि मामला एक ऐसे बोल और सुन नहीं पाने वाले बच्चे से जुड़े संवेदनशीलता का था। ऐसे में भला राज्य के मुखिया को भी नींद कैसे आती ? वे ग्राम पिहरीद की घटना की हर जानकारी से जुड़ते चले गए और पल-पल का अपडेट लेने के साथ दो बार राहुल की माता-पिता, फूफा और दादी से सीधे वीडियों कॉल कर उनका मनोबल बढ़ाया। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल बचाव के लिए दिए जा रहे निर्देशों को भी कलेक्टर से परखा और जिला प्रशासन को बहुत एक्टिव रखने का काम किया।

देश में अब तक के सबसे बड़े रेस्क्यू अभियान की इस सफलता के पीछे एक तरफ बोरबेल में फसे राहुल को बाहर निकालने का संघर्ष जुड़ा है। में सबने देखा कि जरा सी चूक मासूम राहुल की जिंदगी के साथ परिजनों के लिए कैसे भारी पड़ गई। बोरवेल में फसे राहुल को ऊपर लाने रेस्क्यू से जुड़े दल से लेकर परिजनों को खूब जूझना पड़ा। अंततः यह तरकीब सफल नहीं हुई तो बन्द बोरवेल तक 65 फीट खुदाई कर राहुल को बाहर निकालने की भारी मशक्कत की गई। इस बीच नीचे फसे राहुल को कभी उसकी माँ रस्सी पकड़ने और ऊपर आने कह रही थी, तो कभी छोटा भाई ऋषभ कहता रहा कि भय्या राहुल ऊपर आ जाओ, रस्सी पकड़ो, केला खा लो..राहुल ऊपर आ जाओ..,राहुल ऊपर चढ़ जाओ..। यह दृश्य देखने वालों के लिए जहाँ मार्मिक था वही एक ऐसी लाचारी भी थी,जिसमें चाहकर कोई ऐसा कुछ नहीं कर सकता था कि राहुल तुरंत रस्सी पकड़ ऊपर आ जाए। एनडीआरएफ की टीम द्वारा कैमरे के माध्यम से हलचल करते राहुल को देखकर उस तक भेजी गई रस्सी को पकड़ने और ऊपर खींचने की हजार कोशिश भी नाकाम हुई। लगभग 60 फीट की गहराई से राहुल को सुरक्षित निकाल पाना इसलिए भी चुनौती बन गई थी कि वह उस तक भेजी गई रस्सी को पकड़ कर ऊपर आने की कोई कोशिश ही नहीं करता था।

जांजगीर-चाम्पा जिले के मालखरौदा ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम पिहरीद में घटी यह घटना हर जगह सुर्खियों में अब भी है। बोरवेल में राहुल के गिरने से लेकर बाहर आने के इंतजार तक और गहराई में उसके एक एक हलचल की तस्वीर हर मिनट में चर्चा का विषय बनती रही। मौके पर राहुल को किसी तरह बाहर निकालने की जुगत में पूरा प्रशासन मुस्तैद होकर मौके पर मौजूद था। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल घटना के संज्ञान में आते ही स्वयं भी पल-पल की जानकारी ले रहे थे और उन्होंने राज्य सहित जिला स्तर पर भी अधिकारियों को निर्देशित किया हुआ था। मुख्यमंत्री ने दो बार कलेक्टर श्री जितेंद्र कुमार शुक्ला के मोबाइल पर फोन कर राहुल साहू के पिता श्री लाला साहू और माता श्रीमती गीता साहू और दादी श्यामाबाई से वीडियो कॉल कर बातचीत की। उन्होंने राहुल के संबंध में जानकारी लेने के साथ घटना की भी जानकारी ली और भरोसा दिलाया कि आप चिंता न करें। आपके बच्चे को सुरक्षित निकाल लिया जाएगा। बचाव के लिए जो भी जरूरत होगी,पूरा प्रयास किया जा रहा है। शासन-प्रशासन आपके साथ है और भरोसा रखिए। राहुल सकुशल वापस आएगा। मुख्यमंत्री जी का यह ढांढस राहुल के माता-पिता और परिजनों के लिए एक नई उम्मीद बनी।

लगभग 91 घंटे से अधिक समय से बोरवेल में फसे राहुल साहू के लिए जिला प्रशासन का हर अधिकारी कर्मचारी, एनडीआरएफ,एसडीआरएफ एसईसीएल, बीएसपी, बालको,नगर सेना,पुलिस,फायरब्रिगेड,सेना के अफसर रेस्क्यू में लगा रहा। रोबोट का भी सहारा लिया गया। लेकिन कामयाबी नहीं मिली। बोरवेल के बाहर जिला प्रशासन और एनडीआरएफ ने पल-पल कैमरे से राहुल की गतिविधियां ध्यान में रखा। उन्हें केला,सेब और जूस भी दिया जाता रहा। खाने के अलावा उन्हें एनडीआरएफ के जवानों से मनोबल भी मिलता रहा। सभी राहुल को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते रहे। गाँव से लेकर प्रदेश के और देश के हर जानने वाले लोग राहुल के सकुशल वापसी के लिए दुआएं भी करते रहे। अभियान जितना देर चलता रहा,सबकों एक डर यह भी सताते रहा कि इतना देर तक एक मासूम कैसे अपने आपकों बचा कर रख सकता है। लेकिन देश में अब तक के सबसे लंबे समय तक चले आपरेशन राहुल 91 घण्टे बाद भी कामयाब हो गया। बेशक यह शासन-प्रशासन सहित रेस्क्यू टीम की सूझबूझ थी। दूसरी ओर यह भी तो सत्य ही है कि आखिरकार मानसिक रूप से कमजोर समझा जा रहा राहुल जीवन की जद्दोजहद में कहीं भी कमजोर नहीं हुआ। इतने घण्टे सँकरे और अंधरेनुमा स्थान में 60 फीट नीचे फसे रहने के बाद भी राहुल ने अपना साहस और धैर्य बचाकर रखा । यह अलग बात है कि मशीनें जो खुदाई में लगी है वह चट्टानी पत्थर को तोड़ते लगातार काम कर गरम हो जा रही थी। रेस्क्यू में लगे कुछ लोग थक जा रहे थे, मगर राहुल साहू न थका, न हारा। वह तो अपने साहस और हिम्मत से जिंदगी का जंग जीत गया। 10 जून को दोपहर में बोरवेल में गिरने के बाद वह 14 जून को लगभग 91 घण्टे बाद रेस्कयू दल की कोशिशों के साथ बाहर आ सका। अब राहुल की जिंदगी में एक नया सबेरा तो हुआ ही, उन्हें कमजोर समझने वालों को राहुल ने जिंदगी की जंग जीतकर बता दिया कि वह कमजोर नहीं है, वह तो हादसे का शिकार हुआ था और जब विपरीत परिस्थितियां आई तो वह अपनी साहस की बदौलत हारा नहीं। राहुल के ऐसे साहस को सलाम है…

Related Articles

Back to top button